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मिड डे मीलः खाने के बर्तन में तीन साल की बच्ची गिर गई और खाना बनाने वाले को पता ही नहीं चला

मिड डे मील के भगोने में गिरकर बच्ची की मौत हो गई

प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को मिलने वाले भोजन यानी मिड डे मील में ख़राब भोजन मिलना, भोजन में मरे चूहे या फिर छिपकली का मिलना आम बात सी हो गई है, वहीं लापरवाही इस क़दर बढ़ती जा रही है कि खाने के बर्तन में तीन साल की बच्ची गिर गई और खाना बनाने वाले को पता ही नहीं चला.

उत्तर प्रदेश में मिर्ज़ापुर ज़िले के रामपुर अतरी गांव में सोमवार को मिड डे मील के लिए बनाई गई सब्ज़ी के बड़े भगोने में तीन वर्षीय बच्ची की गिर कर मौत हो गई. ग़ुस्साए ग्रामीणों ने स्कूल में ताला लगा दिया और जिलाधिकारी ने स्कूल के प्रधानाचार्य को निलंबित कर दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई का भरोसा दिया है.

मृत बच्ची के पिता भागीरथ कोल ने बीबीसी को बताया कि रसोइया खाना बनाते वक़्त ईयर फ़ोन लगाकर गाना सुन रही थी और खेलते वक़्त बच्ची भगोने में गिर गई. भगीरथ कोल के मुताबिक़, “वहां मौजूद बच्चों ने बताया कि बच्ची के गिरने के बाद काफ़ी देर तक उसे इसलिए नहीं निकाला जा सका क्योंकि निकालने के लिए चिमटा या कोई सामान नहीं मिल रहा था. तुरंत निकाल लिया गया होता तो शायद बच्ची की जान बच गई होती.”

संसद में भ्रष्टाचार का मुद्दा

वहीं मंगलवार को कन्नौज में मिड डे मील बनाते वक़्त सिलिंडर फटने से आग लग गई. स्कूल में भगदड़ मच गई और बच्चे डर के मारे छत पर चढ़ गए. कुछ महीने पहले ही मिर्ज़ापुर में मिड डे मील की जगह बच्चों को नमक रोटी देने और सीतापुर में कथित तौर पर दाल की बजाय हल्दी और पानी देने का मामला सामने आया था. पिछले साल दिसंबर महीने में मुज़फ़्फ़रनगर में बच्चों को परोसे गए मिड डे मील में मरा हुआ चूहा मिला था जिसे खाने के बाद क़रीब एक दर्जन बच्चे बीमार हो गए थे.

उत्तर प्रदेश में मिड डे मील की स्थिति क्या है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि कुछ दिन पहले लोकसभा में एक सवाल के जवाब में मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने जो आंकड़े पेश किए, उसके मुताबिक़ मिड डे मील में भ्रष्टाचार के 52 मामलों में से 14 सिर्फ़ उत्तर प्रदेश के ही हैं.

यही नहीं, मिड डे मील खाने से बीमार होने वाले बच्चों की संख्या के मामले में भी उत्तर प्रदेश अन्य राज्यों की तुलना में काफ़ी आगे है. हालांकि इस मामले में झारखंड यूपी से भी आगे है.

छात्रों के साथ सामाजिक भेदभाव

चाहे खाने की गुणवत्ता का सवाल हो, खाना बनाने में लापरवाही और भ्रष्टाचार का मामला हो या फिर खाना खाते समय छात्रों के साथ सामाजिक भेदभाव का, आए दिन ऐसी ख़बरें आती रहती हैं. कुछ दिन पहले बलिया, प्रतापगढ़ और कुछ अन्य ज़िलों में कथित तौर पर दलित छात्रों को अलग खाना परोसने की ख़बर आई थी और ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है. मिड डे मील यानी मध्याह्न भोजन योजना भारत सरकार और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयास से संचालित योजना है जिसे 15 अगस्त 1995 में लागू किया गया था. पहले इस योजना के तहत बच्चों के अभिभावकों को अनाज उपलब्ध कराया जाता था. लेकिन साल 2004 से सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश के मुताबिक पका-पकाया भोजन प्राथमिक विद्यालयों में उपलब्ध कराने की योजना शुरू की गई. मिड डे मील देने वाले स्कूलों में सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों के अलावा मदरसे भी शामिल हैं.

सोशल ऑडिटिंग की व्यवस्था

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, उत्तर प्रदेश में क़रीब 1,68,768 विद्यालय ऐसे हैं जहां बच्चों को मिड डे मील दिया जाता है, जिसके माध्यम से इन स्कूलों में एक करोड़ 80 लाख से ज़्यादा बच्चों को पौष्टिक भोजन मुहैया कराया जाता है. सप्ताह के हर दिन बच्चों को खाने में क्या दिया जाएगा, इसका बाक़ायदा मेन्यू तैयार है जिसे हर स्कूल में अनिवार्य रूप से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखाया जाता है. इस योजना पर सरकार न सिर्फ़ हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च कर रही है बल्कि मॉनिटरिंग और क्रियान्वयन के लिए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के नेतृत्व में एक प्राधिकरण का गठन किया हुआ है. इसके अलावा सोशल ऑडिटिंग की भी व्यवस्था लागू है.

इतनी सारी क़वायद के बावजूद यह योजना फलीभूत क्यों नहीं हो पा रही है?

वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, “यदि हम यूपी की बात करें तो शहरों में तो ये योजना ठीक काम कर रही है क्योंकि वहां इसकी मॉनिटरिंग भी ठीक होती है और कई स्तर के अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों की निग़ाह पड़ती रहती है. लेकिन गांवों में यह योजना बिल्कुल भगवान भरोसे है. उसकी वजह ये है कि वहां न तो सही समय पर सामान पहुंच पाता है और न ही समय पर भुगतान हो पाता है.”

आईवीआरएस आधारित प्रणाली

दरअसल गांवों में ये व्यवस्था मुख्य रूप से गांव के प्रधान और स्कूल के अध्यापक के विवेक पर चलती है. वहीं शहरी क्षेत्रों में इसकी मॉनिटरिंग अपेक्षाकृत अधिक तत्परता के साथ होती है, इसलिए आमतौर पर शिकायतें ग्रामीण क्षेत्रों से ही ज्यादा आती हैं. सरकार ने योजना की निगरानी यानी मॉनिटरिंग के लिए साल 2010 से आईवीआरएस आधारित प्रणाली को लागू किया है. उत्तर प्रदेश में मिड डे मील प्राधिकरण के निदेशक विजय किरण आनंद बताते हैं, “इस प्रणाली के तहत प्रत्येक विद्यालय दिवस में विद्यालय के प्रधानाध्यापक, अध्यापक अथवा शिक्षा मित्र के मोबाइल नंबर पर स्व-संचालित कॉल की जाती है, जिसके उत्तर अध्यापक भोजन ग्रहण करने वाले बच्चों की संख्या अपने मोबाइल फ़ोन के बटनों पर अंकित नंबरों के माध्यम से अंकित की जाती है. इस प्रकार केंद्रीकृत सर्वर पर भोजन ग्रहण करने वाले बच्चों की संख्या एवं भोजन न बनाने वाले विद्यालयों की संख्या दैनिक स्तर पर अंकित हो जाती है.”

पौष्टिक आहार की व्यवस्था

लखनऊ में एक प्राइमरी स्कूल के हेड मास्टर राजेश सिंह कहते हैं कि स्कूल के स्तर पर किसी तरह के भ्रष्टाचार की कोई गुंज़ाइश ही नहीं है.

वो कहते हैं, “लापरवाही अलग बात है लेकिन घोटाला या भ्रष्टाचार स्कूल के स्तर पर करना संभव ही नहीं है. एक बच्चे के लिए 4.48 रुपये हर दिन के हिसाब से फंड आता है. वह भी समय पर कभी नहीं आता. इसी फंड से सब्‍जी, तेल, मसाला, दूध, गैस सब कुछ मंगाना पड़ता है. इसमें कोई क्या घोटाला करेगा. स्कूल में बच्चों की संख्या 100-150 से ज़्यादा होती नहीं.” जानकारों का भी कहना है कि मिड डे मील का बजट इतना ज़्यादा नहीं है कि तय मानकों के अनुसार बच्चों को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराया जा सके.

उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा मंत्री सतीश द्विवेदी कहते हैं कि मिड डे मील की निगरानी के लिए और मज़बूत तंत्र बनाया जा रहा है और ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ सख़्ती की जा रही है. लेकिन इस सख़्ती के बावजूद मिड डे मील में होने वाली अनियमितताओं की ख़बरें अक़्सर आती रहती हैं.

बीबीसी से बातचीत में सतीश द्विवेदी कहते हैं, “मंडल स्तर पर फ़्लाइंग स्क्वैड का गठन किया जा रहा है जो अचानक किसी भी स्कूल में पहुंच कर मिड डे मील का निरीक्षण कर सकेगा और सीधे शासन को रिपोर्ट करेगा. उन्हें इसके लिए किसी की अनुमति नहीं लेनी होगी. उनकी रिपोर्ट में जो भी ज़िम्मेदार पाया जाएगा, चाहे वो स्कूल के कर्मचारी या ग्राम प्रधान हों या फिर ज़िला स्तर के अधिकारी, उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी.”

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