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आरक्षण को लेकर लोकसभा में बवाल, विपक्ष का आरोप आरक्षण ख़त्म करना चाहती है: सरकार

अदालत एससी और एसटी वर्ग के लोगों को आरक्षण देने के आदेश जारी नहीं कर सकती

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी के बाद एक बार फिर पदोन्नति में आरक्षण को लेकर विवाद गहरा गया है. शीर्ष अदालत ने शु्क्रवार को अपनी टिप्पणी में कहा कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है और इसे लागू करना या न करना राज्य सरकारों के विवेक पर निर्भर करता है. कोर्ट ने कहा कि कोई अदालत एससी और एसटी वर्ग के लोगों को आरक्षण देने के आदेश जारी नहीं कर सकती. सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को विपक्षी नेता आरक्षण पर खतरे के तौर पर देख रहे हैं और इसपर सियासी बवाल शुरू हो गया है.

सुप्रीम कोर्ट का सरकारी नौकरियों की नियुक्ति में आरक्षण और प्रमोशन में आरक्षण को लेकर दिए फैसले पर संसद में सोमवार को जमकर हंगामा हुआ. विपक्षी दलों ने मोदी सरकार की चौतरफ़ा घेराबंदी की. अदालत ने अपने फ़ैसले में ये कहा था कि नियुक्तियों में आरक्षण देने के लिए राज्य सरकारें बाध्य नहीं है. इस पर विपक्ष ने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार आरक्षण को बचाने में नाक़ामयाब रही.

सदन में नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी और टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी ने सराकर पर कई गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है तब से एससी और एसटी आरक्षण पर हमले तेज़ होते जा रहे हैं. कांग्रेस सांसदों ने सदन में ‘मोदी सरकार हाय हाय’ के नारे लगाए. असल में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि राज्य सरकार नियुक्ति में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है और पदोन्नति में आरक्षण कोई मौलिक अधिकार नहीं है.

इसके जवाब में केंद्र सरकार ने दावा किया कि 2012 में उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार थी और उसी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका दायर की थी. रक्षा मंत्री और लोकसभा के उपनेता राजनाथ सिंह ने कहा, “मेरा ये आरोप है कि कांग्रेस संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति कर रही है.”

संसदीय कार्य मंत्री प्रहलाद जोशी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से आग्रह किया कि विपक्षी दलों द्वारा सरकार पर लगाए गए आरोपों को कार्यवाही से बाहर निकाल दिया जाए. इसके जवाब में बिरला ने कहा कि वो इस पर ग़ौर करेंगे.कांग्रेस ने रविवार को कहा था कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले से असहमत है. एनडीए के सहयोगी दल एलजेपी के सांसद चिराग पासवान ने भी लोकसभा में आरक्षण पर दिए फैसले के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई.

इससे पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा, “भाजपा आरक्षण के ख़िलाफ़ है. वह आरक्षण को संविधान से निकालना चाहती है. वे चाहते हैं कि एससी/एसटी कैटेगरी कभी आगे न बढ़े और यह जो कहा गया है कि आरक्षण मौलिक अधिकार ही नहीं है, ये भाजपा की साजिश है. उत्तराखंड की सरकार ने यह बहस की है. आरएसएस-भाजपा वाले चाहे जितने सपने देख लें, लेकिन हम इसे हटने नहीं देंगे. संविधान पर आक्रमण हो रहा है. हर संस्थान को तोड़ा जा रहा है. न्यायपालिका और लोकतंत्र के स्तंभों को एक-एक कर निशाना बनाया जा रहा है.”

असल में सुप्रीम कोर्ट उत्तराखंड सरकार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी. ये याचिका 5 सितंबर 2012 को दायर की गई थी. उस वक़्त राज्य में एससी/एसटी आरक्षण को लागू किए बग़ैर सरकारी नौकरियों में रिक्त सभी पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू की गई थी.

कोर्ट ने क्या कहा था?

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उत्तराखंड हाई कोर्ट के उस आदेश को ख़ारिज़ कर दिया जिसमें पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए राज्य सरकार के एससी और एसटी के आंकड़े जमा करने के निर्देश दिए गए थे. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी राज्य सरकार प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है. हालांकि प्रमोशन में आरक्षण का विवाद नया नहीं है और समय-समय पर कोर्ट और राज्य सरकार इस बारे में अहम कदम उठा चुके हैं.

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