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राजेश खन्ना ने कैसे हिंदी सिनेमा का ट्रेंड बदल दिया, आज तक नहीं टूटा लगातार 15 हिट फिल्मों का रिकार्ड

आंखें झपका के, हल्की टेढ़ी गर्दन की नई अदा, स्टाइल को राजेश खन्ना का सिग्नेचर स्टाइल माना जाता है.

Mumbai: 18 जुलाई 2012 को दुनिया को अलविदा कहने वाले काका (निक नेम) को हमेशा इस बात के लिए याद किया जाएगा कि उन्होंने हिंदी सिनेमा का ट्रेंड बदला.

उनकी कार को लिपिस्टिक से चूमती थीं लड़कियां

राजेश खन्ना का जादू महिलाओं के सिर चढ़कर बोलता था. लड़कियां उन्हें खून से खत लिखती थीं. उनकी तस्वीरों से शादी करती थीं, उन्हें तकिये के नीचे रखकर सोती थीं. उनकी कार को लिपिस्टिक से चूमती थीं.

यासिर कहते हैं, ‘खून से पत्र लिखने की बात पर मुझे यकीन नहीं होता था लेकिन उनके लेटर पढ़ने का काम करने वाले शख्स प्रशांत ने बताया था कि हां यह झूठ नहीं है, खून से लिखे पत्र आते थे. पता नहीं कि वे महिलाएं अपने खून से लिखती थीं या किसी और के.’

यासिर ने एक इंटरव्यू में बंगाल की एक बुजुर्ग महिला का किस्स शेयर किया है. ‘वह बताती हैं कि हमने उस दौर में जो देखा है आप समझ ही नहीं सकते. जब हम उनकी फिल्में देखने जाते थे तो बकायदा हमारी और उनकी डेट हुआ करती थी. मेकअप करके, ब्यूटी पॉर्लर जा के, अच्छे कपड़े पहनकर जाते थे. हमें लगता था वो जो पर्दे की तरफ से पलके झपका रहे हैं और सिर झटक रहे हैं, मुस्कुरा रहे हैं वो हमारे लिए कर रहे हैं. और हाल में बैठी हर लड़की को ऐसा ही लगता था.’

आंखें झपका के, हल्की टेढ़ी गर्दन की नई अदा, स्टाइल को राजेश खन्ना का सिग्नेचर स्टाइल माना जाता है.

हिंदी सिनेमा में नया ट्रेंड लाने वाले अदाकार

हिंदी सिनेमा में राजेश खन्ना की एंट्री राजकपूर, देवानंद, दिलीप कुमार, शशि कपूर जैसे दिग्गज कलाकारों के समय में होती है. यह सामाजिक और राजनीतिक बदलावों को पर्दे पर उतारने और आर्ट व अभिनय की बारीकियों का दौर था. इस दौर की राजकपूर की आवारा, गुरु दत्त की प्यासा, विमल राय की दो बीघा जमीन, महबूब खान की मदर इंडिया, दिलीप कुमार अभिनीत मुगल-ए-आजम, देवदास जैसी फिल्मों का जिक्र किया जा सकता है.

लेकिन एंटरटेनमेंट और लोकप्रिय अभिनय की कमी से यह सिनेमा ज्यादा लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा था. हालांकि इस समय राजेंद्र कुमार, शम्मी कपूर जैसे कालाकार लव, रोमांस केंद्रित फिल्में कर रहे थे लेकिन उनकी फिल्में अब ज्यादा नहींं चल रही थीं.

देवानंद उम्रदराज हो रहे थे

यासिर कहते हैं, ‘राजेश खन्ना की एंट्री एक ऐसे दौर में होती है जब दिलीप कुमार, देवानंद उम्रदराज हो रहे थे. इनकी फिल्में कम आ रही थीं. युवा चेहरों में राजेंद्र कुमार, शम्मी कपूर की फिल्में फ्लाप होने लगी थीं और उनका वजन भी बढ़ने लगा था ऐसे में लोगों को एक फ्रेश चेहरे की तलाश थी.’

वह कहते हैं, ‘हर समय एक रोमांटिक हीरो की जरूरत होती है. हर दौर का युवा अपना रिप्रेजेंटेटिव खोजता है. यह स्लाट खाली हो रहा था और इसे राजेश खन्ना ने भरा.’ वह पारिवारिक फिल्में करते थे, लिहाजा शहरी मिडिल क्लास ने उन्हें हाथोंहाथ लिया.

उन्होंने कहा कि सलमान खान के पिता सलीम खान ने बताते हैं कि राजेश खन्ना जैसा स्टारडम हिंदी सिनेमा में आज तक किसी ने नहीं देखा. सलमान, शाहरुख, रजेंद्र कुमार जैसे एक्टर भी उस लोकप्रियता को कभी नहीं छू पाए.

पीछे चले गए सामाजिक सवाल, कला की वैरायटी खत्म हुई

हिंदी सिनेमा पर रिसर्च करने वाले और मीडिया शिक्षक भूपेन सिंह कहते हैं, ‘राजेश खन्ना बेशक अच्छे कलाकार थे लेकिन उनके अभिनय में एक ही स्टाइल, एक ही अंदाज हमेशा नजर आता थाा. उनके स्टारडम के आगे बाकि वैरायटी वाले कलाकार पीछे चले गए. पूरा बॉलीवुड उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमने लगा.’ वह आगे कहते हैं, ‘राजेश खन्ना बाजार का सिनेमा करते रहे, आर्ट पीछे चला गया.’

लेकिन सिनेमा पत्रकार गजेंद्र भाटी कहते हैं, ‘यह उस दौर की मांग थी. लोग अपनी पसंद के हीरो की फिल्में उसकी खास स्टाइल या एक्टिंग की वजह से भी देखने जाते थे. अमिताभ बच्चन की एंग्री यंग मैन, रजनीकांत सबकी अपनी स्टाइल थी.’ वह कहते हैं कि राजेश खन्ना की फिल्में प्रेम कहानियों के इर्द-गिर्द सामाजिक संदेशों वाली होती थीं.

गजेंद्र कहते हैं, ‘जवाहरलाल नेहरू के समय का सिनेमा आइडियोलॉजी और वैचारिक संकल्पों को लेकर झुका था. सोशियली और फाइनेंसियली बदल रहा इंडिया अपनी एक नई पहचान ढूढ़ रहा था. लोगों की भूख मजा-मस्ती की तरफ बढ़ी. कॉमर्शियलाइजेशन का मकसद ज्यादा लोगों तक अपनी कहानी पहुंचाना था.’

अमिताभ का उभार और राजेश खन्ना के स्टारडम का नीचे जाना

अमिताभ बच्चन के उभार से राजेश खन्ना का स्टारडम नीचे जाना शुरू हुआ. हालांकि इसे नकारते हुए गजेंद्र भाटी कहते हैं, ‘राजेश खन्ना जितना करना था, कर चुके थे. यह इंदिरा गांधी के इमरजेंसी का समय था, समाज में बेरोजगारी जैसे तमाम सवालों को लेकर आक्रोश पनप रह था. ऐसे में एक नए सिनेमा की मांग थी जिसे अमिताभ बच्चन ने पूरा किया. राजेश खन्ना कुछ डिफरेंट नहीं कर रहे थे.’

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